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Tuesday, 18 December 2012

'' सुलोचना की कथा ''



श्री राम -रावण का भयंकर युद्ध चल रहा है. इंदरजीत ने रावण से कहा कि मै शत्रुओ का संहार करूँगा. रावण को हिम्मत बंधाकर इंदरजीत युद्ध करने गया. इंदरजीत और लक्ष्मण भयंकर युद्ध हुआ. युद्ध में लक्ष्मण जी ने इंदरजीत कि भुजा का छेदन किया. वह भुजा इंदरजीत के आँगन में जा पड़ी. इंदरजीत का छिन्न मस्तक उठाकर वानर श्री राम जी के पास ले गए. इंदरजीत कि पत्नी सुलोचना महान पतिव्रता स्त्री थी . आँगन में आये पतिदेव के कटे हुए हाथ को देखकर रोने लगे "ये युद्ध करने रणभूमि गए हुए है. मैंने यदि पतिव्रत धर्म बराबर पालन किया है तो यह हाथ लिखकर मुझको बतावे कि क्या हुआ है" तब हाथ ने लिखा "लक्ष्मण जी के साथ युद्ध करते हुए मेरा मरण हुआ है. मै तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हू" सोलोचना ने सतीधर्म के अनुसार अग्नि में प्रवेश करने का निश्चय किया

सुलोचना रावण का वन्दन करने गई और कहा कि मुझे अग्नि में प्रवेश करना है , आप आज्ञा दे

उस समय रावण पुत्र - वियोग में रो रहा था. इंदरजीत जैसे अप्रितम वीर युवा पुत्र कि मृत्यु हो चुकी है और अभी पुत्रवधू अग्नि में प्रवेश करने कि आज्ञा मांगती है . रावण का हृदय अतिशय भर आया. उसने सुलोचना से कहा "पुत्रि! मै तुमसे और कोई बात तो कहता नहीं, अग्नि में प्रवेश करने से तुम्हारा मरण मंगलमय होगा परन्तु तुम एक बार रामजी के दर्शन करो, रामजी का वंदन करो. तुम्हारा जीवन और मरण दोनों सुधरेंगे

सुलोचना अत्यंत सुंदर थी. अत्यंत सुंदर पुत्रवधू को कट्टर शत्रु के पास जाने के लिए रावण ने कहा. उससे सुलोचना को बहुत आश्चर्य हुआ. उसने रावण से कहा. "आप मुझे शत्रु के घर भेजते है? वहा मेरे साथ अन्याय हुआ तो ?"

रावण ने कहा "मैंने रामजी के साथ वैर किया है, परन्तु रामजी मुझे शत्रु नहीं मानते. " रावण का रामजी के प्रति कितना विश्वास है? जवान योद्दा वीर पुत्र युद्ध में मृतक हुआ है. और उस समय रावण रामजी के प्रशंसा कर रहा है. पुत्र-वियोग मे रामजी कि आहुति कर रहा है. उसने कहा "मुझे विश्वास है कि राम जी के दरबार मे अन्याय होता नहीं. रामजी तुझे माता समान मानकर तुझको सम्मान देंगे. तुम्हारी प्रशंसा करेंगे. जहा एक्पत्नीव्रतधारी रामजी है, जहाँ जितेन्द्रिय लक्ष्मण जी है, जहाँ बाल ब्रह्मचारी हनुमान जी विराजमान है, उस राम दरबार मे अन्याय नहीं. मेरा एसा विश्वास है कि रामजी के दर्शन से ही जीवन सफल होता है. अग्नि में प्रवेश करने के पहले रामजी के दर्शन कर लो

अतिसुंदर पुत्रवधू को श्री राम के पास जाने कि आज्ञा रावण देता है. सुलोचना रामचंदर जी के पास जाती है. प्रभु ने सुलोचना कि प्रशंसा कि है और कहा है कि यह दो वीर योदाओ के बीच का युद्ध नहीं था. ये दो पतिव्रता स्त्रियों के बीच का युद्ध था. लक्ष्मण कि धर्म पत्नी उर्मिला महान पतिव्रता है और यह सुलोचना भी महान पतिव्रता है. यह लक्ष्मण और इंदरजीत के मध्य का युद्ध नहीं था. उर्मिला और सुलोचना के मध्य का युद्ध था. दो पतिव्रताओ का युद्ध था.

सुग्रीव ने पूछा कि महाराज! सुलोचना महान पतिव्रता है, ऐसा आप जोर देकर वर्णन कर रहे है तो फिर उसके पति का मरण क्यों हुआ?

रामजी ने कहा - 'सुलोचना के पति को कोई मार नहीं सकता था. परन्तु उर्मिला कि जीत हुई. उसका एक ही कारण है कि सुलोचना के पति ने परस्त्री में कुभाव रखनेवाले रावण कि मदद कि और उर्मिला के पति परस्त्री में माँ का भाव रखनेवाले के पक्ष में थे. इससे उर्मिला का जोर अधिक था. नहीं तो सुलोचना के पति को कोई मार नहीं सकता था.

सुलोचना को रामदर्शन करने में आनंद हुआ. प्रभु ने उसके पति का मस्तक उसको दिया. पति देव के मस्तक को देखकर सुलोचना रोने लगी. रामजी को दया आयी, रामजी ने कहा "बेटी! रोओ नहीं, तू हमारी पुत्रि है. तेरी इच्छा हो तो तेरे पति को जीवित कर दू. एक हजार वर्ष कि आयु दे दू. तुम लंका में आनद से राज्य करो. मै यही से वापिस लौट जाऊ, तू रोती है वह मुझे तनिक भी सहन नहीं .

सुलोचना को आश्चर्य हुआ. लोग रामजी के विषय में जो वर्णन करते है वह बहुत ही सामान्य करते है. राक्षसों को भी रामजी भले लगते है. रामजी का बखान करते है, तब फिर देवता और ऋषि रामजी

 का बखान करे, इसमें कोई आश्चर्य नहीं, मै कैसे उन का बखान कर सकता हु. रामजी अतिशय सरल है.......
                                                                                                                                 जयश्री राम जी    |

Thursday, 13 December 2012

'' धार्मिक क्रियाकलापों का वैज्ञानिक महत्त्व ''




धार्मिक क्रियाकलापों का वैज्ञानिक महत्त्व
 हमारा पूरा ब्रह्मांड ऊर्जा के प्रवाह पर ही आधारित है। ऊर्जा अलग-अलग रंगों की कंपन शक्ति से मिलकर कहीं अधिक, कहीं कम, कहीं सकारात्मक तथा कहीं नकारात्मक रूप में प्रवाह होती रहती है। यदि ऊर्जा का प्रवाह हमारे शरीर, घर, मंदिर या किसी भी स्थान पर असंतुलित होता है, तो वह किसी भी सजीव वस्तु के लिए शारीरिक या मानसिक असंतुलन पैदा करने का कारण होता है। प्राचीन समय में हमारे ऋषि-मुनियों को हर प्रकार की ऊर्जा के बारे में ज्ञात था, इसीलिए उन्होंने हमारी पूजा के क्रियाकलाप या धार्मिक क्रियाकलाप को इस तरह से बनाया कि वह हमारी शारीरिक व मानसिक ऊर्जा को सकारात्मक तरीके से संतुलित बनाये रखता है। इसी प्रकार कुछ ऐसे पशुओं व पेड़ों को पहचान लिया था  जिनका ऊर्जा क्षेत्र मानव के ऊर्जा क्षेत्र से दोगुना या चैगुना बड़ा है | ऐसे पशुओं व वृक्षों को  हमारी धार्मिक क्रिया में शामिल किया गया था।
     नकारात्मक ऊर्जाएं हमारे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित करती हैं। यदि हम नकारात्मक विचार रखते हैं, तो मानसिक अस्थिरता का कारण होते हैं और हमारे शरीर की कंपन शक्ति में बदलाव आता  है। न केवल हमारे शरीर में, बल्कि यह हमारे घर के वातावरण को भी प्रभावित करती है क्योंकि यह नकारात्मक विचार एक कंपन शक्ति के रूप में प्रवाह करते हैं। हमारी मानसिक स्थिति वास्तु  दोष की तीव्रता को दोगुना याचौगुना कर देती है। हमारे नकारात्मक विचार कंपन शक्ति के रूप में उसमें जुड़ते रहते हैं | इसी तरह से रत्नों  तंत्र-मंत्र तथा यंत्रो मे भी सकारात्मक व नकारात्मक ऊर्जा होती है |
      घर में प्रतिदिन हम दीपक जलाते हैं, दीपक जलाते समय हम गाय का घी, सरसों का तेल या तिल का तेल आदि प्रयोग करते हैं। इसका वैज्ञानिक कारण यह है, कि गाय का घी सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है तथा सरसों का तेल व तिल का तेल नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करता है। अतः हमें दीपक जलाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि हम किस उद्देश्य से दीपक जला रहे हैं। हम घर में कपूर भी जलाते हैं , कपूर को जलाने से पहले उसकी कंपन शक्ति कम होती है, परंतु जलाने के बाद उसकी  कंपन शक्ति बढ़ जाती है। तिरुपति भगवान के प्रसाद के लड्डू में भी खाने वाले कपूर का प्रयोग किया जाता है। कपूर वायरस को रोकता है। घर या मंदिर में पूजा करते समय जो हम घंटी बजाते हैं, उस ध्वनि से एक कंपन शक्ति उत्पन्न होती है जो नकारात्मक ऊर्जा को काटती है। इसीलिए घर के हर कोने में घंटी बजानी चाहिए। पूजा में नारियल का भी अपना महत्व है,नारियल को पंचभूतों का प्रतीक माना जाता है। जब हम चोटी वाला नारियल हाथ से पकड़कर तोड़ते हैं, तो हमारी हथेली के सारे एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर दवाब पड़ता है।
    इसी प्रकार जब हम किसी को तिलक लगाते हैं  तो उसका भी एक अपना महत्व है। हमारी पांचों अंगुलियां पंचभूतों का प्रतीक हैं। अंगूठा अग्नि का, तर्जनी अंगुली वायु का, मध्यमा अंगुली गगन का, अनामिका पृथ्वी का तथा कनिष्ठिका जल का प्रतीक होती हैं। हम तिलक लगाने में अधिकतर अनामिका अंगुली का प्रयोग करते हैं इसका अर्थ है, कि जिसको तिलक लगा रहे हैं वह भूमि तत्व से जुड़ा रहे। प्राचीन समय में योद्धा जब युद्ध पर जाते थे, तो उन्हें अंगूठे से त्रिकोण के रूप में तिलक लगाया जाता था, अग्नि वाली अंगुली से अग्नि के प्रतीक के रूप में तिलक लगाने से उनके आग्नेय चक्र में अग्नि रूप शक्ति समाहित हो जाती थी, जिससे वह बड़ी वीरता के साथ युद्ध स्थल में युद्ध करते थे। तिलक हमेशा गोलाकार या त्रिकोण (पिरामिड आकार) के रूप में ही लगाया जाता है। पहले समय में तिलक को लगाने के लिए कुमकुम, सिंदूर और केसर को मिलाकर प्रयोग किया जाता था, जिससे बैंगनी रंग की ऊर्जा निकलती थी जो हमारी आग्नेय चक्र की आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाती थी। उस समय स्त्रियां जब तिलक लगाती थीं तथा मांग भरती थीं, तो वह हमारे ऊपर के चक्रों को बैंगनी रंग की ऊर्जा से हमारे आध्यात्मिक चक्रों को ऊर्जा प्रदान करती थी। आजकल हम बिंदी के नाम पर स्टीकर लगाते हैं उसके पीछे जो चिपकाने वाला पदार्थ होता है वह सूअर की चर्बी से बना होता है, जिनको लगाने से हमारी बुद्धि भ्रष्ट होती जा रही है।
    स्त्रियां जो कांच की चूड़ियां पहनती हैं वह सिलीकान  मिट्टी से बनी होती  हैं तथा ये भूमि तत्व का प्रतीक होती हैं। स्त्रियों के ऊपर नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने पर चूड़ियां उस ऊर्जा को अपने ऊपर लेकर टूट जाती है। स्त्रियों की कलाई में गर्भाशय के एक्यूप्रेशर बिदुं भी होते हैं, चूड़ियों के इधर-उधर खिसकने से उन पर दवाब पड़ता रहता है जिससे वे सक्रिय रहते हैं और स्त्रियों को गर्भाशय संबंधी परेशानी का सामना बहुत कम करना पड़ता है | परंतु आजकल फैशन के इस दौर में केवल शादी या पार्टी के समय जब साड़ी पहनते हैं तभी कुछ स्त्रियाँ   कभी-कभी एक-दो घंटे के लिए कांच की चूड़ियां पहन लेती  हैं, अन्यथा इनका प्रयोग विशेषकर शहरों में स्त्रियों ने बिल्कुल ही बंद कर दिया है।यह सब घोर मूर्खता के कारण हो रहा है |
  नवजात शिशु को काली पोत की माला पहनाने से उनपर राहु-केतू व शनि की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव नहीं होता है। स्त्रियों को कमर से निचले भाग में चांदी का आभूषण पहनने के लिए कहा गया है । इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि चांदी नकारात्मक ऊर्जा को रोकती है, स्त्री का गर्भाशय एक उल्टा पिरामिड शेप में है जिसका नीचे का नुकीला हिस्सा ऊर्जा ऊपर की तरफ खींचता है तथा स्त्री जब गर्भधारण करती है, तब गर्भाशय मूलाधार चक्र से ऊपर की तरफ ऊर्जा खींचता है जो बच्चे के विकास में सहायक होता है। पैरों से होती हुई नकारात्मक ऊर्जा गर्भाशय तक न पहुंचे, उसे रोकने के लिए पैरों में चांदी की पायल तथा कमर बंध का प्रयोग किया जाता था। दक्षिण भारत की स्त्रियां पैरों में हल्दी लगाती हैं, जो नकारात्मक ऊर्जा को रोकने में सहायक होती है। प्राचीन समय में पुरुष भी पैरों में चांदी के मोटे-मोटे कड़े पहनते थे जिसका कारण था कि वे नगें पैर लंबा सफर भी पैदल ही करते थे। पैरों के द्वारा नकारात्मक ऊर्जा उनके शरीर में न आ सके, इसलिए पैरों में चांदी का प्रयोग किया जाता था। हमारे भारत में मेंहदी लगाने का एक विशेष महत्व है। जब मौसम बदलता है तो शरीर की सारी गर्मी निकालने के लिए मेंहदी का प्रयोग हाथ और पैरों में लगाकर करते हैं क्योंकि हाथ-पैरों में हमारे नाड़ियों के बिंदु होते हैं जिसके द्वारा यह ऊर्जा बाहर निकलती है।
   भारत में शादी भी एक उच्चतर वैज्ञानिक प्रक्रिया है। शादी से पहले लड़के और लड़की को हल्दी और बेसन का उबटन लगाया जाता है जो शरीर के अंदर वाली नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालती है तथा बाहर से आने वाली नकारात्मक ऊर्जा को रोकती है। आग के चारों तरफ भांवर या सात फेरे लेने का भी अपना महत्व है क्योंकि पंचभूतों में अग्नि ही सबसे पवित्र ऊर्जा मानी जाती है। किसी भी वस्तु को शुद्ध करने के लिए उसे आग में तपाया जाता है तथा इच्छानुसार आकार दिया जा सकता है| इसी तरह  वर-वधु एक-दूसरे का हाथ पकड़कर जब सात फेरे अग्नि के चारों तरफ लेते हैं, तो उन दोनों के बीच की जो नकारात्मक ऊर्जा होती है वह उस अग्नि में भस्म हो जाती है और उनका एक नया रिश्ता आकार लेता है। सात फेरे सात दिन का भी प्रतीक होते हैं। वधू को लाल कपड़े पहनने को कहा जाता है क्योंकि लाल और पीला रंग नकारात्मक शक्ति को रोकता है। शादी के बाद लड़की को काली पोत का मंगल सूत्र पहनाया जाता है जिससे उसको कोई नकारात्मक शक्ति प्रभावित न करे। पूजा स्थल जैसे, मंदिर हमारे यहां सबसे ज्यादा सकारात्मक ऊर्जा का स्थान माना जाता है। यहां पर लोग अपने दुःख-दर्द लेकर आते हैं तथा यहां पर आकर उनको मानसिक शांति का अनुभव होता है। इसलिए इनकी स्थापना करते समय हमें बहुत ही ध्यान रखना चाहिए। मंदिर को बहुत ही सकारात्मक ऊर्जा का क्षेत्र बनाना चाहिए। जब मंदिर के लिए भूमि पूजन होते हैं व  वहां पर मूर्ति की स्थापना होनी होती है, वहां पर नव धान्य नवरत्न गाड़ देते हैं तथा वहां पर गायमूत्र छिड़कते थे | मंदिर में हमेशा मंत्रोंच्चारण होते रहते हैं तथा हवन व यज्ञ होते रहते हैं जिससे मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है| भगवान को फूलों से अलंकृत किया जाता है क्योंकि प्रत्येक फूल का ऊर्जा क्षेत्र मानव के ऊर्जा से अधिक होता है इसलिए दक्षिण भारत की स्त्रियां अपने बालों में फूलों व गजरों का प्रयोग करती हैं। पूजा के समय हाथ में कलावा बांधा जाता है। यह बाहरी नकारात्मक ऊर्जा को रोकता है तथा शरीर के अंदर की ऊर्जा को खींचता है। जब इसका रंग फीका पड़ने लगे या अधिक से अधिक नौ दिनों में हमें इसे अपने हाथ से खोल देना चाहिए। वेद मंत्रों का उच्चारण कपूर आदि जलाकर मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा इतनी बढ़ायी जाती है कि वहां पर जाकर हमें एक आत्मिक आनंद का अहसास होता है। भारत में कई तीर्थ स्थल ऐसे हैं, जिनका अपना एक विशेष महत्व है तथा वह ऐसी ऊर्जा ग्रहित क्षेत्रों में स्थापित किये गये हैं कि वहां जाने पर वहां की सकारात्मक ऊर्जा हमारी नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर देती है|



'' स्त्रियाँ क्योँ लगाती हैँ माँग मेँ सिन्दूर ''



स्त्रियाँ क्योँ लगाती हैँ माँग मेँ सिन्दूर और इसकी वैज्ञानिकता क्या?

(1)भारतीय वैदिक परंपरा खासतौर पर हिंदू समाज में शादी के बाद महिलाओं को मांग में सिंदूर भर
ना आवश्यक हो जाता है। आधुनिक दौर में अब सिंदूर की जगह कुंकु और अन्य चीजों ने ले ली है। सवाल यह उठता है कि आखिर सिंदूर ही क्यों लगाया जाता है। दरअसल इसके पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण है। यह मामला पूरी तरह स्वास्थ्य से जुड़ा है। सिर के उस स्थान पर जहां मांग भरी जाने की परंपरा है, मस्तिष्क की एक महत्वपूर्ण ग्रंथी होती है, जिसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं। यह अत्यंत संवेदनशील भी होती है।

यह मांग के स्थान यानी कपाल के अंत से लेकर सिर के मध्य तक होती है। सिंदूर इसलिए लगाया जाता है क्योंकि इसमें पारा नाम की धातु होती है। पारा ब्रह्मरंध्र के लिए औषधि का काम करता है। महिलाओं को तनाव से दूर रखता है और मस्तिष्क हमेशा चैतन्य अवस्था में रखता है। विवाह के बाद ही मांग इसलिए भरी जाती है क्योंकि विवाहके बाद जब गृहस्थी का दबाव महिला पर आता है तो उसे तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी बीमारिया आमतौर पर घेर लेती हैं।पारा एकमात्र ऐसी धातु है जो तरल रूप में रहती है। यह मष्तिष्क के लिए लाभकारी है, इस कारण सिंदूर मांग में भरा जाता है।


(2)मांग में सिंन्दूर भरना औरतों के लिए सुहागिन होने की निशानी माना जाता है। विवाह के समय वर द्वारा वधू की मांग मे सिंदूर भरने के संस्कार को सुमंगली क्रिया कहते हैं।

इसके बाद विवाहिता पति के जीवित रहने तक आजीवन अपनी मांग में सिन्दूर भरती है। हिंदू धर्म के अनुसार मांग में सिंदूर भरना सुहागिन होने का प्रतीक है। सिंदूर नारी श्रंगार का भी एक महत्तवपूर्ण अंग है। सिंदूर मंगल-सूचक भी होता है। शरीर विज्ञान में भी सिंदूर का महत्त्व बताया गया है।

सिंदूर में पारा जैसी धातु अधिक होनेके कारण चेहरे पर जल्दी झुर्रियां नहीं पडती। साथ ही इससे स्त्री के शरीर में स्थित विद्युतीय उत्तेजना नियंत्रित होती है। मांग में जहां सिंदूर भरा जाता है, वह स्थान ब्रारंध्र और अध्मि नामक मर्म के ठीक ऊपर होता है।
सिंदूर मर्म स्थान को बाहरी बुरे प्रभावों से भी बचाता है। सामुद्रिक शास्त्र में अभागिनी स्त्री के दोष निवारण के लिए मांग में सिंदूर भरने की सलाह दी गई है।

Monday, 10 December 2012



भारतीय विद्यानों ने सात लोगों को चिरंजीवी माना है :-
                         अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनुमांन विभीषण।कृप: परशुराम सप्तैते चिरंजीवीतः||
अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेद व्यास, हनुमान , विभीषण , कृपाचार्य व परुशाराम को चिरंजीवी माना गया है | इसी श्रृंखला में हनुमान जी का नाम सबसे पहले आता है क्योंकि हनुमान जी का लक्ष्य इनमे सबसे बडा है, बल्कि अनन्त है। उसे एक सामान्य मानव जीवन अवधि तो क्या ऊपर वर्णित दीर्घायु में भी प्राप्त करना संभव नहीं। यह तो तभी संभव है जब प्राणी अनन्त समय तक अहर्निश सशरीर प्रयास रत रहे। अब प्रश्न उठता है कौन सा है वह लक्ष्य है व क्यों होती है आवश्यकता उसे पाने के लिए अहर्निश प्रयास की | वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के चालीसवें सत्र में इस बारे में प्रकाश डाला गया है। लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब श्रीराम उन्हें युद्घ में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञता स्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमान जी श्री राम से याचना करते हैं कि-
              यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय: ||"
अर्थात हे वीर श्रीराम ! इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहे।"" इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते है कि-
 एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशय:। चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्ति: शरीरे प्यवस्तथा। लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा  ।
 अर्थात् ""हे कपिश्रेष्ठ। ऎसा ही होगा। इसमें संदेह नहीं है। संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही। जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेगी।"" स्पष्ट है हनुमान जी ने जब श्रीराम कथा के प्रचलित रहने तक शरीर में प्राण रखने की कामना प्रकट की तो श्रीराम ने उन्हें न केवल तब तक उनके शरीर में प्राण रहने का आर्शीवाद दिया अपितु इन लोकों अर्थात् ब्रह्माण्ड के बने रहने तक रामकथा के स्थिर रहने का वचन भी दिया।सीधे शब्दों में कहा जा सकता है कि जब तक यह ब्रह्माण्ड रहेगा रामकथा स्थिर रहेगी और रामकथा की स्थिरता तक हनुमान जी सशरीर विद्यमान रहेगें। राम चरित मानस में माँ जानकी ने भी उन्हें अजर एवं अमर होने का आर्शीवाद दिया है।
                          अजर अमर गुन निधि सुत होहु। करहु बहुत रघुनायक छोहु
स्पष्ट है हनुमान जी 6 चिरंजीवियों से भी आगे बढकर अजर एवं अमर हैं और फिर वे अजर एवं अमर क्यों नहीं हो जब इन्होंने संकल्प लिया है कि -
                            वांछितार्थ प्रदस्यामि भक्तानां राघवस्य तु। सर्वदा जागरूको स्मि, राम कार्य धुरंधर:  ।
श्री राम रहस्योपनिषद में उनकी यह घोषणा है कि वह श्रीराम के भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने के लिए संकल्पित एवं मनसा-वाचा-कर्मणा सचेष्ट हैं। वह राम काज करने में न केवल धुरंधर हैं अपितु सदैव सजग एवं क्रियाशील भी हैं। रामकाज प्रारम्भ करने पर उसे पूर्ण किये बिना विश्राम लेना उन्हें तनिक भी पसन्द नहीं।
उनकी रामकथा सुनने की आतुरता एवं रामकाज के प्रति उत्साह की झलक हमें हर युग में मिलती है। त्रेता युग में दशरथ पुत्र श्रीराम की सेवा में अपलक समर्पित हैं तो द्वापर में अर्जुन के रथ के ध्वज पर आसीन होकर महाभारत के चक्षुदर्शी साक्षी है। महाभारत की समाप्त पर भीम के बल दर्प को दूर करने के लिए वृद्ध बानर के रूप में प्रस्तुत हैं तो कलियुग में भक्त कवि तुलसीदास को चित्रकूट के घाट पर श्रीराम के दर्शन कराने के लिए विप्ररूप में उपस्थित हैं। ये कुछ घटनाएं मात्र उदाहरण स्वरूप हैं वरना वे प्रतिदिन उन करोडों लोगों की प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहायता करते हैं जो श्रीराम का स्मरण करते हैं और हाँ वे उनके सामने सशरीर प्रकट होने को भी आतुर हैं जो उन्हें अपने दृढ संकल्प, अगाध श्रद्घा एवं पूर्ण समर्पण से प्राप्त करने की क्षमता एवं पात्रता रखते हैं।


'' भगवान के चौबीस अवतार ''



 श्रीमद्भागवत कथा मे सुना ......सुबह शाम भगवान के चौबीस अवतारों का नामों का स्मरण करने से दुःख और क्लेश से मुक्ति मिलती है ।पुराणानुसार चौबीस अवतार कहे जाते हैं।
सनकादि ऋषि: (ब्रह्मा के चार पुत्र)
नारद
वाराह
मत्स्य
यज्ञ (विष्णु कुछ काल के लिये इंद्र रूप में)
नर-नारायण
कपिल
दत्तात्रेय
हयग्रीव
हंस पुराण।हंस
पृष्णिगर्भ
ऋषभदेव
पृथु
नृसिंह
कूर्म
धनवंतरी
मोहिनी
वामन
परशुराम
राम
व्यास
कृष्ण
बलराम
गौतम बुद्ध
कल्कि

Sunday, 9 December 2012

'' चरणामृत का क्या महत्व है? ''



चरणामृत का क्या महत्व है?
अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है.क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की.कि चरणामृतका क्या महत्व है शास्त्रों में कहा गया है
                अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
                विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।
"अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप- व्याधियोंका शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है।जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता"जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता,जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है.
जब भगवान का वामन अवतार हुआ,और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे मेंऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडलु में से जल लेकरभगवान के चरण धोए और फिर चरणामृतको वापस अपनेकमंडल में रख लिया.वह चरणामृत गंगा जी बन गई,जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है,ये शक्ति उनके पास कहाँ से आई ये शक्ति है भगवान के चरणों की.जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी .जब हम बाँके बिहारी जीकीआरती गाते है तो कहते है -
                           "चरणों से निकली गंगा प्यारी , जिसने सारी दुनिया तारी "
धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवनकिया जाता है।
चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।कहते हैं भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।
चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है।चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है।उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है।तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए।ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है।कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ काम या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है। इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये, लेकिन चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं।
चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं?दरअसल शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है।कहते हैंइससेविचारोंमेंसकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है।इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।..



'' हमेशा अच्छा करो ''


एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोजाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहां से ...गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी ,वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी जिसे कोई भी ले सकता था .एक कुबड़ा व्यक्ति रोज उस रोटी को ले जाता और वजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बडबडाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "
दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा ,वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बडबडाता"जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "
वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है ,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है और न जाने क्या क्या बडबडाता रहता है ,
मतलब क्या है इसका ".एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी ".और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में जहर मिला दीया जो वो रोज उसके लिए बनाती थी और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली "हे भगवन मैं ये क्या करने जा रही थी ?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दीया .एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी ,
हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेके "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा " बडबडाता हुआ चला गया इस बात से बिलकुल बेखबर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है .हर रोज जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था .महीनों से उसकी कोई खबर नहीं थी.
शाम को उसके दरवाजे पर एक दस्तक होती है ,वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है ,
अपने बेटे  को अपने सामने खड़ा देखती है.वह पतला और दुबला हो गया था. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था ,भूख से वह कमजोर हो गया था. जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा,उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ. जब मैं एक मील दूर है, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर. मैं मर गया होता,
लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था ,उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लीया,भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे ,  मैंने उससे खाने को कुछ माँगा ,उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि "मैं हर रोज यही खाता हूँ लेकिन आज मुझसे ज्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो " .जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी माँ का चेहरा पिला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा लीया ,उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था.अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौतऔर इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था
"जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।

" निष्कर्ष "
~हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या न हो .
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